नवरात्रि महाउत्सव कलश और स्थापना का शुभ मुहूर्त

नवरात्रि महाउत्सव 17 अक्टूबर’2020( शनिवार ) से आदि शक्ति माँ दुर्गा की उपासना की शुरुआत हो रही है।

इन नौं दिनों तक देवी दुर्गा के नौं रूपों की पूजा की जाती है !! माँ शैलपुत्री , ब्रह्मचारणी , चंद्रघंटा , कुष्मांडा , स्कंदमाता , कात्यानी , कालरात्रि,महागौरी और सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है !! नवरात्रि  पूजा के पहले दिन  कलश स्थापना  की जाती है और समस्त देवी-देवताओं का आह्वान किया जाता है और इसके बाद नौ दिनों तक माँ के अलग-अलग रूपों का पूजन होता है कलश को भगवान विष्णु का रुप माना जाता है !!

कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त

इस साल कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त – शारदीय नवरात्रि 2020 17 अक्टूबर, 2020,शनिवार  का समय 06:23:22 से 10:11:54 तक अवधि 3 घंटे 48 मिनट है !! नवरात्रि में कलश स्थापना का खास महत्व होता है। स्थापना शुभ मुहूर्त में किया जाए, तो देवी दुर्गा प्रसन्न होती हैं और मनचाहा फल    मिलता है !! , नवरात्रि के दौरान 9 दिनों तक की जानें वाली पूजा सार्थक नहीं मानी जाती और शुभ फलों की प्राप्ति भी नहीं होती अगर कलश स्थापना शुभ महूर्त में ना हो । कलश स्थापना के लिए अभिजीत मुहूर्त का समय सबसे उत्तम माना गया है।

कलश स्थापित करने से घर में सुख-समृद्धि और शांति आती है। कलश को बेहद मंगलकारी माना जाता है। शास्त्रों में कलश के मुख में भगवान विष्णु, गले में रूद्र, मूल में ब्रह्मा और मध्य में देवी शक्ति का निवास बताया गया है। नवरात्रि के दौरान स्थापित किए जाने वाले कलश में संसार की सभी शक्तियों का घट के रूप आह्वान कर उसे स्थापित किया जाता है। स्थापना करने से घर पर आने वाली सभी परेशानियों से मुक्ति मिलती है।

कलश स्थापना की सामग्री

  • मिट्टी का कलश – चौड़े मुँह वाला (सोने, चांदी या तांबे का कलश भी ले सकते हैं) और ढक्कन
  • लाल कपड़ा
  • नारियल
  • गंगाजल
  • सतनाज (सात तरह के अनाज)
  • पवित्र स्थान की मिट्टी
  • कलावा/मौली
  • पीपल, बरगद, जामुन, अशोक और आम के पत्ते (इनमें से कोई भी 2 प्रकार के पत्ते )
  • कच्चा साबुत चावल (अक्षत)
  • सुपारी
  • फूलों की माला और फूल
  • फल
  • और मिठाई

कलश स्थापना की संपूर्ण विधि

सूर्योदय से पहले उठें और स्नान आदि करके साफ कपड़े पहन लें। कलश स्थापना  की जगह को अच्छे से साफ़ करके एक लाल रंग का कपड़ा बिछा लें और माता रानी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।  किसी बर्तन में मिट्टी डालकर उसमें जौ के बीज डालें और बीच में कलश रखने की जगह हो।

कलश मौली से बांध दें और बीच में रखकर उपर स्वास्तिक का चिन्ह बनाएँ। कलश में गंगाजल भर दें और उसपर कुमकुम से तिलक करें । कलश में साबुत सुपारी, फूल, इत्र, पंच रत्न, सिक्का और पांचों प्रकार या दो प्रकार के के पत्ते ऐसे ऱखें कि वह थोड़ा बाहर की ओर दिखाई दें। और ढक्कन लगा दें और ढक्कन को अक्षत से भर दें।लाल रंग के कपड़े में एक नारियल को लपेटकर उसे मौली से बाँधकर ढक्क्न पर रख दें। नारियल का मुंह आपकी तरफ होना चाहिए।

कलश को टीका करें, अक्षत चढ़ाएं, फूल माला, इत्र और नैवेद्य यानी फल-मिठाई आदि अर्पित करें। जौ में पूरे 9 दिनों तक नियमित रूप से पानी डालते रहें,अखंड ज्योति भी जला सकते  हैं। कलश स्थापना के बाद माँ दुर्गा के शैलपुत्री रूप की पूजा करें। और देवी-देवताओं का आह्वान करते हुए कलश की पूजा करें।

शैलपुत्री को चढ़ाने वाला प्रसाद शुद्ध गाय के घी से बनाएं। इसके अलावा अगर  जीवन में कोई परेशानी है या बीमारी है तो भी माता को शुद्ध घी चढ़ाने से शुभ फल प्राप्त होता है।

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